Friday, October 30, 2009

रोज मिलते हैं

रोज मिलते हैं दिन और रात
एक काली स्याह रात में ढलने
एक तपतपाती दोपहर में तपने ।
रोज मिलते हैं दिन और रात एक सतरंगी मुस्कान लिए
उन्हें काली गहरी रात का कोई सदमा नहीं
तपतपाती दोपहर में भुन जाने का कोई खौफ नहीं ।
रोज मिलते हैं दिन और रात एक शबनमी मुस्कान लिए
एक अन्तरंग चुप्पी लिए
अहसासों की अदला बदली करते
न इधर देखते न उधर देखते अपलक निहारते एक दूसरे को
कभी ढलते हैं काली गहरी रात में
कभी आग उगलती दोपहर में
स्वर्णिम आभा लिए रोज मिलते हैं दिन और रात

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